लेखन आपके मन का खालीपन भरता है . मन को सुकूं मिलता है ,.मेरे भीतर जब कोई अभाव कसमसाता है तब शायद रचना जन्म लेती है, मुझे पता नहीं चलता आभाव क्या पर कोई रिक्तता होती है है कुछ उद्द्वेलित करता है इन भावों की आत्यंतिक उत्कटता और विचारों का सघन प्रवाह मेरे शब्दों को आगे बढ़ाता है मेरी कलम में उतर आता है . कभी शब्द मुझमे थिरकन पैदा कर देते हैं कभी जड़ बना देते हैं मुझे क्षण -क्षण सघनतर होते हुवे विचारों के बादलों को कोई बरसने से रोक नहीं पाती हूँ तो कलम उठानी ही पड़ती है .
मार्च 07, 2010
मुझको स्वीकार न था
मेरे मन को ये आमंत्रण कभी स्वीकार न था
बूँद ही सही इक दिन चमकूंगी बन कर मोती
लहरों में गुम हो जाना मुझको स्वीकार न था
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर " से
मार्च 06, 2010
ये दुनिया किसने बनाई ?

पूछ रहे मुझ से ये दुनिया किसने बनाई॥?
क्यों रोशनी से भरा महल ये तेरा
क्यों मेरी झोंपड़ी में घनघोर अँधेरा
क्यों तेरी आँखें चाँद सी चमके
क्यों मेरी आँखों में है करुनाई
वो नंगे भूखे ................
पूछ रहे मुझसे ........
क्यों तुझको सुख सेज बिछाता
क्यों मुझको दुःख की शैया सुलाता
या नज़र में उसकी हम इंसान नहीं
या फ़िर एक नहीं है अपना रघुराई
वो नंगे भूखे ....
पूछ रहे मुझसे .......
क्यों हमीं पे गिरती बिजलियाँ मुफ़लिसी की
क्यों हमीं को डूबोते ये ग़म के धारे
क्यों थामे रहता दर्द दामन हमारा
क्यों टूटते हमारी ख्वाहिशों के तारे
वो नंगे भूखे ......
पूछ रहे मुझसे ....
मरी पुस्तक एक कोशिश रोशनी की ओर "से
चल साथी मेरे साथ चल

चल साथी मेरे साथ चल
चल आज किसी के दर्द-ग़म
खुद उनकी ज़बानी सुनते हैं
बहुत सुन चुके दर्द के गीत गज़ल
किसी आहत को कुछ तो राहत देंगे
तेरे अंतर की करुना,मेरा नयन जल
ये जीवन पहेली मुस्किल जिनको
आ हम-तुम ढूंढें उनकी ख़ातिर कोई हल
जो हैं अंधेरों में उनकी ख़ातिर चाँद मनायें
जो तपिश में, खींच लायें उनके लिए बादल
आ हम-तुम,तुम-हम करके सब मिल जाएं
फ़िर न होगी कभी अपनी राहें मुश्किल
मैं तम से अकेले नहीं लड़ सकती
चल साथी मेरे साथ चल
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
ऐसा क्या लिख दूं
मेरे मरने के बाद वो लफ्ज़ मेरी आवाज़ हो जाये
मेरी पुस्तक एक कोशिश रोशनी की ओर "से
आख़िर कब तक
सीता से लेकर
तसलीमा नसरीन तक
होना पड़ा भूमिगत
आख़िर क्यों ...?
आख़िर कब तक ॥?
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर" से
रक्त कण
दया- करुना
लज्जा-समर्पण
श्रधा -विश्वास
शांति -संवेदना
तप -त्याग
स्नेह -सहृदय
क्षमा -सहानुभूति
धैर्य -संतोष
नहीं करवा रही हूँ
आपका परिचय
किसी शब्द कोष से
ये वो "रक्त कण "है -
जो बहतें हैं -
हर औरत की रगों में
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

आंसू लाचारी के
जाने- अनजाने खुद को ही सज़ा न दीजिये
सृष्टि हो जायेगी मानव विहीन बिन नारी के
फ़िर रोओगे बैठकर आंसू अपनी ही लाचारी के
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
भावों का पानी
उलट गई है संस्कारों की थाली
मन-मटके में नहीं भावों का पानी
आदर्शों का डिब्बा खाली-खाली
बासी हुई सुगंध सम्बन्धों की
रिश्ते हुए हैं ज़हर की प्याली
पावन नही रही अग्नि चूल्हे की
कुंठा के धुएं से घर-दीवारें काली
आँखें मुस्काती कुटिल मुस्काने
मुख का अभिवादन बन गाया गली
बिखरी आदर -सत्कारों की रंगोली
टूट गई मान मनुहारों की डाली
पेड़ों पर लोभ लालच की अमराई
उगी फ़सलो पर ग़द्दारी की बाली
विकसी दूषित विचारों की फुलवारी
फ़ैली पाप अधम की हरियाली
दया करुना के पक्षी न आ पते अन्दर
छल -कपट बन गया मन का माली
वासनाओं से भरा भौंरों का गुंजन
तितलियों मुख नहीं लाज़ की लाली
कच्चे पड़ गये प्रण के पत्थर
ढह गई इमारतें मिसालों वाली
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
मार्च 05, 2010
लड़की
कहकर मुझको ,
ज़न्मता मेरी ही कोख से
तुम्हारे घर का उजाला
कड़वा समझ गिरा देते जिसे-
हाथ में लेने से पहले ,
जो तुमको लगता अमृत -
मुझी में पनपता वो प्याला
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से
ज़िन्दगी मुस्कराती रहे
दुलरा कर उठाती रहे
चढ़ते सूरज की रोशनी
क़िस्मत आपकी चमकाती रहे
शाम की सुर्ख लालिमा
जीवन में नये रंग लाती रहे
दिल से यही दुआ है हरदम
आपकी ज़िन्दगी मुस्कराती रहे
हवाओं की रुन-झुन भरे-
जीवन में मधुर संगीत
चन्द्र की चांदनी हुलस-हुलस-
लिखे आपके लिए सुख के गीत
राहें पग-पग पर फूल बिछाती रहे
दिल से यही दुआ है हरदम
आपकी ज़िन्दगी मुस्कराती रहे
मन कोयल कुहुक-कुहुक गाये
खुशियाँ पल-पल साए में आये
यश का फ़लक हो बाजू में
समृधियाँ शीश झुकाती रहे
दिल से यही दुआ है हरदम
आपकी ज़िन्दगी मुस्कराती रहे
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से
माफ़ करना पड़ा
मेरी आँखे उस बेवफ़ा की याद में
दिल को न चाहते हुए भी
उसका हर गुनाह माफ़ करना पड़ा
दो बूँद समुद्र के नाम से
चेहरा तो उसी का होता है
चेहरा तो उसी का होता है
जब भी या खुदा बोलती हूँ लब से
दिल में नाम उसी का होता है
में कहां करती हूँ कुछ अपने मन से
जो वो चाहे वही होता है
रोती भी हूँ तो सिर्फ़ अश्क मेरे बहते हैं
दिल में दर्द तो उसी का होता है
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से

चंद क़दम भी साथ देता ऐसा इक भी इंसान न था
रोशनी के लिए दिल भी अपना जलाया कई-कई बार
ज़िन्दगी में फ़िर भी उजालों का नामो निशान न था
तमाम उम्र जिसको पूजा था,पूजा की हर इक विधि से
वक्ते -रुखसत पता चला कि वो मेरा भगवान न था
दिल का दरवाज़ा खटखटाता रहा जो दिल के जगने तक
दरवाज़ा खोला तो पाया वो इस दिल का मेहमान न था
मौत से पहले मुश्किल था यारों खुद को दफ़न कर देना
वरन ज़िन्दगी भर तो हम पे किसी का कोई अहसान न था
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से
उठ रहा था
सूरते दीद सा कुछ मेरे दिल से उठ रहा था
शायद बुझ रही थी उम्मीदों की शमाएँ मेरी
या कि ख्वाहिशों का ज़नाज़ा उठ रहा था
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से
मत खेलो
बड़ी सुन्दर ज़िन्दगी है ये इसें नरक में मत धकेलो
धरा को इश्वर का सुन्दर वरदान हो तुम
पल-पल याद रखो ,जानवर नहीं इंसान हो तुम
"दो बूँद समुद्र के नाम "से
कहीं धूप में
कहीं बर्फ में गले लोग
दर्दो-ग़म की बस्ती में
तन्हाई के काफ़िले लोग
बारूदों की तल्ख़ धूप में
खूं-पसीने से गिले लोग
बिन जुर्म जो काटे सज़ा
वो सलीब की कीलें लोग
कुछ पड़े हैं लाशों जैसे
कुछ हैं गिद्द-चीलें लोग
सागर थे जो सूख गए
बचे रेत के टीले लोग
खूं भी नहीं खौलता अब
नहीं होते लाल-पीले लोग
पाप अधम के बाजों पर
नाच रहे रंगीले लोग
दुनिया की फुलवारी पे
उग आये कंटीले लोग
बिन पैंदे के लोटे सब
नहीं रहे हठीले लोग
कंचन वर्ण सी काया में
कलुष भरे पतीले लोग
नफस नफ़स ज़हर भरा
दिखते नही नीले लोग
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
माँ तुम
तुम सतरंगी स्नेह -आँचल
तुम मंदिर प्रांगन सी पवित्र
तुम पावन -पुनीत गंगाजल
टेढ़ा -मेढ़ा विकट जीवन जगत
तुम सीधी-सादी सरल प्रांजल
छल ,छदम ,कपट चारों तरफ़
माँ तेरी गोदी निर्मल ,निश्छल
पावक ,अनल सामान जीवन
तुम चन्दन की छाया शीतल
तेरे आशीषों की ज्योत्सना से
पथ मेरा नित -नित उज्जवल
पाने तेरा वात्सल्य सोम -सुधा
ज़न्म-ज़न्म पी लूँ जीवन गरल
तेरी कोख पाने की अभिलाषा में
स्वयं -भू भी है आतुर प्रतिपल
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
मार्च 04, 2010
खुद ही से दर जायेगा आदमी
सरपट भागती हुई ज़िंदगी में
कंही ठहर जायेगा आदमी
कसैला-विषैला मन का वातावरण
जीते जी मर जाएगा आदमी
ख्वाहिशों के ताने -बाने में
खुद बिखर जायेगा आदमी
दौड़ता हुआ सभ्यता की अंधी दौड़
संस्कृति बिसर जायेगा आदमी
मशीनों के बीच बन गया है मशीन
जाने किधर जायेगा आदमी
देख लिया जो शीशा इक दिन अनजाने में
खुद ही से डर जायेगा आदमी
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रौशनी की ओर " से

