मार्च 10, 2011

कौन है वो



किसने किया बूंद-बूंद भर कर रिम-झिम सावन
किसने पहनायी इन फूलों को इतने रंगों की पेहरन
चाँद किनारे किसने लटकाई ये रेशमी किरण
लताओं के अन्दर किसने भर दी इतनी थिरकन
 किसने भरी शिशिर की आँचल में इतनी सिरहन
 किसने सिखया कोयल को गाना दे मधुर कुंजन
किसने सिखाया मोर को पिहु-पिहु करके करना नर्तन
कौन करता है नभ के सिने पर मेघों का आच्छादन
कौन है वो जिसके इशारों पर दामिनी करती तर्जन
तितली को करके रंग-बिरंगा भौंरों को किसने दी गुंजन 
किसने भरी सूरज की भृकुटी में इतनी अगन 
बना  नदी,नाले,पहाड़ किसने बनाई दुनिया इतनी मन-भावन  
कौन है वो जिसने थाम रखा है सदियों से ये विशाल गगन
कौन  है जो दिखता नहीं है हमको परदेता हमको स्पंदन 
कौन है जो मिट्टी के सांचे सा बनाता बिगाड़ता   जीवन
निश्चय  ही वो छुपा-छुपाया   बैठा होगा या तेरे या मेरे अंतर्मन
काश! वो एक बार मुझे मिल जाये कंही मैं भी तो देखूं कैसी है उसकी चितवन
आशा पण्डे ओझा मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर" से एक कविता { कौन है वो 


आशा


मार्च 21, 2010

ग़ज़ल हर एक लफ्ज़ में ग़म अपना ढाल लेते हैं
 हर इक वरक पर कलेजा निकाल लेते हैं
 हम जानते हैं ये पहलू भी दोनों तेरे ही हैं
 सुकून भर को ये सिक्का उछाल लेते हैं 
अजीब शोर है अहसास का मेरे दिल में
 गुब्बारे दिल से ये सागर निकाल लेते हैं
 ज़हर पियेगा भला कौन इन हवाओं का
 मिज़ाजे शिव की तरह खुद में ढाल लेते हैं
तेरी बेवफ़ाई पे यकीं करें तो मर ही जायें शायद 
यह ख़याल ही दिल से निकाल लेते हैं
 ये दर्दो -ग़म भी कहाँ ख़त्म होंगे आशा के
 ले ज़िन्दगी तुझे बस इक सवाल देते हैं 


मार्च 20, 2010

इक तेरे तसव्वुर ने महबूब यूं संवार दी ज़िन्दगी
कि तेरे बगैर भी हमने हँस कर गुजार दी ज़िन्दगी
राहें -मुहब्बत में दर्दो -ग़म देने वाले बेदाद सुन
तेरी इस सौगात के बदले हमने निसार दी ज़िन्दगी
तमाम उम्र यूं रखा हमने अपनी साँसों का हिसाब
जैसे किसी सरफ़िरे ने ब्याज़ पर उधार दी ज़िन्दगी
बात मुक़दर की जब आये शिकवा -गिला बेमानी है
जिसने तुझे गुल बनाया उसी ने मुझे ख़ार दी ज़िन्दगी
तूं ही बता ऐ ख़ुदा उसकी आतिश -अफ़सानी कैसे बुझे
चाह-ऐ-सुकूं में जिस शख्स को तूने अंगार दी ज़िन्दगी
हर इक ग़म को बड़े करीने से हँसी में छुपा लिया हमने
ऐ ख़ुदा तेरा शुक्रिया ,क्या खूब हमें फनकार दी ज़िन्दगी
किनारों की खफगियों से इस दर्ज़ा शिकस्त हुआ दिल
आख़िरकार "आशा " ने गिर्दाब में उतार ली ज़िन्दगी

तेरे बारे में बस इतनी खबर है
मेरे दिल में आज भी तेरा घर है
ताज दौलत से बनता, मुहब्बत से नहीं
प्यार ग़रीब का क्या कमतर है
आज महताब घर से निकला ही नहीं
या बैठा उनकी जुल्फों में छुपकर है
वादियाँ गुल से महकाने वालों की
सिसक रही ज़िंदगी काँटों पर है
ज़ख्म तो भर गए तेरी बेवफाई के
दर्द का अभी बाक़ी कुछ असर है

रिश्ते - नाते

न जाने ये कैसे रिश्ते नाते हैं
चाह कर भी जो तोड़े नहीं जाते हैं
रोम -रोम गाता जिनकी स्नेह गाथा
वो नफरतों का गम हमें दे जातें हैं
बेसबब रूठे रहते हैं अक्सर हमसे
लाख चाहें तो भी हम मना नहीं पाते हैं
फ़िर से जिनको चुनना आसां न हो
रिश्तों के मोती ऐसे क्यों बिखरातें हैं
हम हँसना चाहें साये में जिनके
ज़ार-ज़ार बार-बार वो हमें रुलाते हैं
मोह की नाव ले जाती हमें उनकी ओर
वो हैं कि कटुता के भंवर बिछाते हैं
इतना भी न गिराओ नज़रों से इनको
रिश्ते कच्चा काच हैं ,चटक जाते हैं
मेरी पुस्तक" एक कोशिश रोशनी की ओर "से

मार्च 19, 2010

दरो-दिवार सजाते हैं

हम शको-शूबह की आग बुझाते हैं
चल विश्वास के दरिया बहाते हैं
कर लेते हैं इंसानियत को बिछोना

प्यार मुहब्बत का तकिया लगाते हैं
चैनो - सुकूं की ओढ़ कर नर्म चादर
आँखों को ऊंचाई के ख़्वाब दिखातें हैं
चल सजाकर भाईचारे की थाली में
मिलकर मसर्रतों की मिठाई खातें हैं
दिखा अपने -अपने हुनर के तमाम रंग
अपने मुल्क के दरो-दीवार सजाते हें
मेरी पुस्तक "'इक कोशिश रोशनी की ओर "'से

मार्च 16, 2010

ये आंसू

ये आंसू फिर आज दीवाने हैं

फिर यादों में मीत पुराने हैं

जान चुके हम जिन को दिल से

क्यों रिश्ते वही अनजाने हैं

लाख छुपाऊँ जग से बातें

ढलकर अश्क कह जाने हैं

दर्द भरे इन रिश्तों के

आख़िरी हिचकी तक माने हैं

टूट गएँ हैं पर न बिखरेंगे

ज़ख्में जिगर तुझे दिखाने हैं

इन अश्कों को हम न पोंछेंगे

तेरे दिए जो नजराने हैं

आ जाओ तो जी भर रोलें

अश्कों के मोती तुम पे लुटाने हैं

खुद को तन्हा कैसे कह दें

साथ मेरे तेरे अफ़साने हैं

हर इक दोलत साए में है

जब तक तेरी याद के खजाने हैं

तुमको चाह कर कुछ ना चाहा

सरशारी मेरी रब भी जाने हैं

हैं कितने गहरे दिल के रिश्ते

ये अश्क उसी के पैमाने हैं

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर'

संवेदनाओ के घने बादलों को

संवेदनाओं के घने बादलों को
नफरतों की हवा उड़ा ले गई
लहलहाती फ़सलें भाईचारे की
बाढ़ स्वार्थों की उन्हें बहा ले गई
बदरंग हो गई तस्वीर मेरे शहर की
धूप छल -कपट की रंग सभी उड़ा ले गई
जिस आग को मैं बुझाने चली थी
वही आग मुझको भी जला ले गई
रिश्तों में यूँ चले क़त्ल के सिलसिले
ये सदी जाने कहाँ शर्मो-हया ले गई
जाने कैसी डकैती पड़ी मेरे शहर में
हर शरीर से उसकी आत्मा चुरा ले गई
इंसाफ में उठती थी जो चंद आवाजें
कुछ मजबूरियां उन्हें भी दबा ले गई
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

मार्च 15, 2010

दर्द मेरे ज़हन का [कैद पंछी ]


मैं साथी था काभी इस उड़ते पवन का


आँखों में सपना था निस्सीम गगन का


जी भर जीता था जीवन हर एक क्षण का


अब तो दाना-पानी भी नहीं अपने मन का


क्या करूँ पिंजरे में ठहरे हुए इस जीवन का


मैं मालिक नहीं रहा जहाँ अपने ही फ़न का


कोई नहीं समझता यहाँ दर्द मेरे क्रन्दन का


वो तन्हा नीड रोता होगा मेरे घर-आँगन का


दिन के उजाले में भी अँधेरा अकेलेपन का


कभी सूरज था बांहों में,आज प्यासा किरण का


मेरी राह तकता होगा वो साथी मेरे बचपन का


जंजीरों में बंध गया,हर सपना मेरी पलकन का


आपनो का दर्द भी नहीं समझ पाता जो मानव


कैसे समझ पायेगा भला दर्द मेरे दिलो-जहन का



मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम " से

मार्च 14, 2010

मैं चिड्कली [ बेटी ]


अनचाही तुम्हारे आँगन उतरती

मिल जाये तो स्नेह के नहीं तो

केवल संस्कारों के दाने चुनती

जरुरत भर उछलती

जरुरत भर मचलती

घर भर स्नेह पंखों की छाया करती

नित नव दायित्वों के पाठ समझती

जरुरत भर उड़ती

जरुरत भर फुदकती

दिखाओ तो देख लेती सूरज की किरणें

नहीं तो अंधेरों के ही साये में पलती

जरुरत भर आँख खोलती

जरुरत भर बोलती

जितने दिन रहने दो अपने आँगन

बैठी रहती,जिस दिन उड़ाओ

चुपचाप किसी अन्य आँगन जा ठहरती

अधिकारों को बिसराती

कर्तव्यों का पालन करती

मैं चिड्कली


मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर " से

अनुराग


हवा मिस- झुक -लुक -लुक -छुप

डार-डार से करे अंखियां चार

कस्तूरी हुई गुलाब की साँसें

केवड़ा,पलाश करे श्रृंगार

छूते ही गिर जाये पात लजीले

इठलाती-मदमाती सी बयार

सुन केकि-पिक की कुहूक-हूक

बौरे रसाल घिर आये कचनार

अम्बर पट से छाये पयोधर

सुमनों पर मधुकर गुंजार

कुंजर,कुरंग,मराल मस्ती में

मनोहर,मनभावन संसार

यमुना- तीरे माधव बंशी

फिर राधे-राधे करे पुकार

नख-शिख सज चली राधे-रमणी

भर मन-अनुराग अपरम्पार


मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

ग़रीब का जीवन


'दर्द 'के समृद्ध महल हैं

'रंज़" की ऊँची दीवारें

'दुःख 'का रंग रोगन सजा

बंधी 'वेदनाओं ' की बन्दनवारें

'विपदाओं के बाग़ -बग़ीचे

'करुण'झूलों की कतारें

'आंसू 'के रिमझिम सावन

'कसक' की शीतल फुहारें

'चिंताओं 'के झाड़-फानूस से

'सजते' घर के गलियारे

'बेबसी के पलंग पर लेटी

दुल्हन'पीड़ा 'की चीत्कारें

'सूनेपन की साँझ में आता

दूल्हा'मजबूरी घर -द्वारे

दे 'अभावों ' की महंगी मिठाई

करते लाडलों की' मनुहारें '

पा 'दुत्कारों 'के खेल -खिलौने

खिलतीं बच्चों किलकारें

रोज़ सजाते आँगन देहरी

दीपक से 'आहों 'के अंगारे

'भूख 'परी सी छम -छम आती

टिम-टिम करते 'टीस' के तारे

जब' अरमानों का चूल्हा' जलता

मिल बैठ खाते ग़म सारे

'कंटक -प्रस्तर' के कोमल बिस्तर

बजती आल्हादित स्वपन झंकारें

'अँधेरे 'लिखते जिस की यश गाथा

यही है 'ग़रीब 'का जीवन प्यारे


मेरी पुस्तक '"एक कोशिश रोशनी की ओर'" से



मार्च 12, 2010

आ पहुंचा सृष्टि का काल


छुपे अंगारे दीपक लो में
लहुलुहान रंग -ओ -गुलाल है
संभल के उड़ना ओ रे पंछी
हर दिशा प्रलय का जाल है
विष का सागर नीलम आँखे
मुस्काने प्रवंचना की चाल है
राम सा आनन रावण मन
छल ने धरी मृग -छाल है
परख पहन रिश्तों के चोले
घात में बैठा विष व्याल है
मौत के घुंघरू छनक उठे
विध्वंस देता करताल है
घर -दरवाज़े थाप ठोकता
आ पहुंचा सृष्टि का काल है

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर " से

सुनामी [२६दिस्म्बर २००४]

वो डूबती हुई ज़िंदगियाँ
वो उफनता हुआ समन्दर
वो सिसकती,तड़फती सांसे
वो काल का भयावह मंज़र

दर्द के दरिया में डूब गई
किश्तियाँ कितनी मसर्रतों की
ये कैसा तूफाँ आया जो बूझा गया
अनगिनत शमाएँ हसरतों की

हर नज़र ढूंढ रही अपनों के चेहरे
हर धड़कन को अपनों का इंतजार
जाने किधर बूँद -बूँद सी बिखर गई
इस समन्दर की बाँहों में जीवन धार

डूब गये थे कुछ ख़्वाब सुहाने
डूब गई थीं कुछ मधुर आशाएं
डूब गए थे खुशियों के अंजुमन
थीं हर सू बांह फैलाती निराशाएं

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

पदचिन्ह

इसलिय नहीं छोड़ रही हूं
अपने पदचिन्ह
कि शायद करे कोई मेरा अनुसरण
बल्कि इसलिए गहरे गड़ा रही हूं
ज़मीन में अपने पाँव
ताकि बता सकूँ दुनिया को
तमाम अवरोधों,विरोधों
आंधी ,तूफ़ानो के बावजूद
मन के पावों में उठती
दर्द भरी टीस के उपरान्त भी
रुकना मंजूर न था मुझको
मेरे पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

मार्च 08, 2010

जय -जय भगवाधारी

सुख सुविधाएँ भोगे सम्पूर्ण
बहुतेरे साधू गृहस्थ ,संसारी
डोंगी,कपटी छलिया,छपटी
पाखंडी, मायावी,व्यभिचारी
रुद्राक्ष,तिलक भगवा,धारकर
फुसलाते जन-मन बारी-बारी
दो खोटे मनके चार मन्त्रों के बल पर
माने खुद को ज्ञान के अधिकारी
वेद, पुराण टिका, भाष्यों पर
तनिक न बुद्धि गईं विचारी
एसी घर कारें,व्यपार की कतारें
दौलोत ,सोहरत पे जाते बलिहारी
फिल्म,राजनीति ,कल्बऔर कैफे
सुस्वादिष्ट व्यंजन के चस्कारी
अफीम,दारु ,भंग -चरस-गांजा
करते सेवन पान,गुटखा,सुपारी
माँ,बहन,बेटी किसी को न छोड़े
रूप ,विषय ,वासना के पूजारी
हाथ कमंडल,माथे पे जटाजूट
ठग,दुष्टि ,धूर्त ,बड़े विषधारी
करतूतें,कारनामे रोज की खबरें
अक्सर घेरे रहते इनको डंडाधारी
फ़िर भी आसक्ति अंध है हमारी
यह कैसी फ़ैली धर्म की महामारी
हर तरफ जय-जय भगवाधारी

इस देश का संबल बनो

नव पीढी तुम इस देश का संबल बनो
माहौल कीचड़ है तो क्या तुम कमल बनो
जो जलना चाहता है उसके लिए अंगार बनो
चैन-सुकूं जो चाहे उसके लिए जलधार बनो
चंड-प्रचंड ज्वाला कहीं, कहीं गंगाजल बनो
नव पीढी तुम .......
माहौल कीचड़ ........
वतन की खुशहाली तेरी आँखों का सपन हो
दिल में हो वतन परस्ती,सर पर कफ़न हो
हर क़दम हो दृढ़ता भरा,कभी न विचल बनो
नव पीढी तुम ......
माहौल कीचड़ ........
तोड़ दो उन हाथों को जो छीनते ग़रीब का निवाला
वतन से जो करते ग़द्दारी, कर दो उनका मुंह काला
अमा की इस रात को परास्त कर, तुम चांदनी धवल बनो
नव पीढी तुम .........
माहौल कीचड़ .......
जाति-धर्म की मानसिकता से तुम्हे उबरना होगा
मन में सिर्फ़ एकता-अखंडता का भाव भरना होगा
आज़ादी के इस खेत में प्रेम भाईचारे की फसल बनो
नव पीढी तुम .......
माहौल कीचड़ .....
अधिकारों के मद में अपने कर्तव्यों को मत भूलो
उड़ान हौसलों की ऐसी हो कि हर बार गगन छूलो
सारी सृष्टि नत-मस्तक हो जाये,तुम इतने मुकम्मल बनो
नव पीढी तुम .....
माहौल कीचड़ है ........
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

मार्च 07, 2010

वह आदमी जीते जी मर गया
दहसत में जो घर छोड़ कर गया

ख़ूबसूरती की जो इक मिसाल था
वह आइना-ऐ -दिल से डर गया

यों बरसा ग़म का पगला बादल
सहरा-ऐ-दिल बन समंदर गया

वह आज़ाद परींदे सा आया
गया तो प्रीत सें बंध कर गया

अस्मत लुटा की खुदकशी जिसने
उसें देखने पूरा शहर गया

हाय !उसी शहर की अनदेखी से
एक परिवार भूख से मर गाया

आंतक का ये आवारा सांड
चैन-सुकून की फ़सलें चर गया