लेखन आपके मन का खालीपन भरता है . मन को सुकूं मिलता है ,.मेरे भीतर जब कोई अभाव कसमसाता है तब शायद रचना जन्म लेती है, मुझे पता नहीं चलता आभाव क्या पर कोई रिक्तता होती है है कुछ उद्द्वेलित करता है इन भावों की आत्यंतिक उत्कटता और विचारों का सघन प्रवाह मेरे शब्दों को आगे बढ़ाता है मेरी कलम में उतर आता है . कभी शब्द मुझमे थिरकन पैदा कर देते हैं कभी जड़ बना देते हैं मुझे क्षण -क्षण सघनतर होते हुवे विचारों के बादलों को कोई बरसने से रोक नहीं पाती हूँ तो कलम उठानी ही पड़ती है .
मई 02, 2011
हम चाहते थे व्यवस्था बदले
मार्च 10, 2011
कौन है वो
किसने किया बूंद-बूंद भर कर रिम-झिम सावन
किसने पहनायी इन फूलों को इतने रंगों की पेहरन
चाँद किनारे किसने लटकाई ये रेशमी किरण
लताओं के अन्दर किसने भर दी इतनी थिरकन
किसने भरी शिशिर की आँचल में इतनी सिरहन
किसने सिखया कोयल को गाना दे मधुर कुंजन
किसने सिखाया मोर को पिहु-पिहु करके करना नर्तन
कौन करता है नभ के सिने पर मेघों का आच्छादन
कौन है वो जिसके इशारों पर दामिनी करती तर्जन
तितली को करके रंग-बिरंगा भौंरों को किसने दी गुंजन
किसने भरी सूरज की भृकुटी में इतनी अगन
बना नदी,नाले,पहाड़ किसने बनाई दुनिया इतनी मन-भावन
कौन है वो जिसने थाम रखा है सदियों से ये विशाल गगन
कौन है जो दिखता नहीं है हमको परदेता हमको स्पंदन
कौन है जो मिट्टी के सांचे सा बनाता बिगाड़ता जीवन
निश्चय ही वो छुपा-छुपाया बैठा होगा या तेरे या मेरे अंतर्मन
काश! वो एक बार मुझे मिल जाये कंही मैं भी तो देखूं कैसी है उसकी चितवन
आशा पण्डे ओझा मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर" से एक कविता { कौन है वो
आशा
मार्च 27, 2010
मार्च 21, 2010
हर इक वरक पर कलेजा निकाल लेते हैं
हम जानते हैं ये पहलू भी दोनों तेरे ही हैं
सुकून भर को ये सिक्का उछाल लेते हैं
मार्च 20, 2010
रिश्ते - नाते
मार्च 19, 2010
दरो-दिवार सजाते हैं
मार्च 17, 2010
मार्च 16, 2010
ये आंसू
ये आंसू फिर आज दीवाने हैं
फिर यादों में मीत पुराने हैं
जान चुके हम जिन को दिल से
क्यों रिश्ते वही अनजाने हैं
लाख छुपाऊँ जग से बातें
ढलकर अश्क कह जाने हैं
दर्द भरे इन रिश्तों के
आख़िरी हिचकी तक माने हैं
टूट गएँ हैं पर न बिखरेंगे
ज़ख्में जिगर तुझे दिखाने हैं
इन अश्कों को हम न पोंछेंगे
तेरे दिए जो नजराने हैं
आ जाओ तो जी भर रोलें
अश्कों के मोती तुम पे लुटाने हैं
खुद को तन्हा कैसे कह दें
साथ मेरे तेरे अफ़साने हैं
हर इक दोलत साए में है
जब तक तेरी याद के खजाने हैं
तुमको चाह कर कुछ ना चाहा
सरशारी मेरी रब भी जाने हैं
हैं कितने गहरे दिल के रिश्ते
ये अश्क उसी के पैमाने हैं
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर'
संवेदनाओ के घने बादलों को
मार्च 15, 2010
दर्द मेरे ज़हन का [कैद पंछी ]

मार्च 14, 2010
मैं चिड्कली [ बेटी ]

अनुराग
ग़रीब का जीवन
मार्च 12, 2010
आ पहुंचा सृष्टि का काल
लहुलुहान रंग -ओ -गुलाल है
संभल के उड़ना ओ रे पंछी
हर दिशा प्रलय का जाल है
विष का सागर नीलम आँखे
मुस्काने प्रवंचना की चाल है
राम सा आनन रावण मन
छल ने धरी मृग -छाल है
परख पहन रिश्तों के चोले
घात में बैठा विष व्याल है
मौत के घुंघरू छनक उठे
विध्वंस देता करताल है
घर -दरवाज़े थाप ठोकता
आ पहुंचा सृष्टि का काल है
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर " से
सुनामी [२६दिस्म्बर २००४]
वो उफनता हुआ समन्दर
वो सिसकती,तड़फती सांसे
वो काल का भयावह मंज़र
दर्द के दरिया में डूब गई
किश्तियाँ कितनी मसर्रतों की
ये कैसा तूफाँ आया जो बूझा गया
अनगिनत शमाएँ हसरतों की
हर नज़र ढूंढ रही अपनों के चेहरे
हर धड़कन को अपनों का इंतजार
जाने किधर बूँद -बूँद सी बिखर गई
इस समन्दर की बाँहों में जीवन धार
डूब गये थे कुछ ख़्वाब सुहाने
डूब गई थीं कुछ मधुर आशाएं
डूब गए थे खुशियों के अंजुमन
थीं हर सू बांह फैलाती निराशाएं
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
पदचिन्ह
अपने पदचिन्ह
कि शायद करे कोई मेरा अनुसरण
बल्कि इसलिए गहरे गड़ा रही हूं
ज़मीन में अपने पाँव
ताकि बता सकूँ दुनिया को
तमाम अवरोधों,विरोधों
आंधी ,तूफ़ानो के बावजूद
मन के पावों में उठती
दर्द भरी टीस के उपरान्त भी
रुकना मंजूर न था मुझको
मेरे पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
मार्च 08, 2010
जय -जय भगवाधारी
बहुतेरे साधू गृहस्थ ,संसारी
डोंगी,कपटी छलिया,छपटी
पाखंडी, मायावी,व्यभिचारी
रुद्राक्ष,तिलक भगवा,धारकर
फुसलाते जन-मन बारी-बारी
दो खोटे मनके चार मन्त्रों के बल पर
माने खुद को ज्ञान के अधिकारी
वेद, पुराण टिका, भाष्यों पर
तनिक न बुद्धि गईं विचारी
एसी घर कारें,व्यपार की कतारें
दौलोत ,सोहरत पे जाते बलिहारी
फिल्म,राजनीति ,कल्बऔर कैफे
सुस्वादिष्ट व्यंजन के चस्कारी
अफीम,दारु ,भंग -चरस-गांजा
करते सेवन पान,गुटखा,सुपारी
माँ,बहन,बेटी किसी को न छोड़े
रूप ,विषय ,वासना के पूजारी
हाथ कमंडल,माथे पे जटाजूट
ठग,दुष्टि ,धूर्त ,बड़े विषधारी
करतूतें,कारनामे रोज की खबरें
अक्सर घेरे रहते इनको डंडाधारी
फ़िर भी आसक्ति अंध है हमारी
यह कैसी फ़ैली धर्म की महामारी
हर तरफ जय-जय भगवाधारी