मार्च 04, 2010

कैसे सुनूं बसंत की चाप

ऐ मन बता कैसे सुनूँ बसंत की चाप

नज़र ओ मन पे हावी आंतक की छाप

चंग, मृदंग पे गोले -बारूद की थाप

वक्त को लगा जाने ये किसका श्राप

सुलग रही हवाएं,रोशनी रही कांप

मन हुआ कातर विनाश सृष्टि का भांप

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

वक्त नई कहानी का है

मैं परेशान हूँ क्योंकि वक्त परेशानी का है
मेरा नहीं मसला वतन की जिंदगानी का है

ये सुलगते मंज़र,ये संवेदनाओं की ख़ामोशी
वाकई मैं हैरान हूँ क्योंकि वक्त हैरानी का है

बैठे रहेंगे कब तक यूं मूँद कर अपनी आँखें
जगो!वक्त अब हर ज़र्रे पर निगरानी का है

ये ख़ामोशी,ये अनजानापन आखिर कब तक
हटा दो मुंह से हाथ ये वक्त मुखर वाणी का है

धुंधले हुए इतिहास के पृष्ठों पर रचे हुए हरूफ़
वक्त को इंतज़ार अब इक नई कहानी का है

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

ढूंढ लेता है

आंधियां लाख तोड़े चाहे नीड़

पांखी फिर भी बसेरा ढूंढ लेता है

कितनी ही लम्बी क्यों न हो रात

सूरज फ़िर भी सवेरा ढूंढ लेता है

मेरी पुस्तक" एक कोशिश रोशनी की ओर "से

अर्थ भर

ना ही बहुत लम्बी उम्र

न ही युग-युगांतर

मैं जीवन जीना चाहती हूँ

छोटा किन्तु अर्थ भर

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

अनाथ

उसके कांधों पर नहीं रहा अब भारी बस्ते का बोझ
क्योंकि उसके कांधे ढो रहें हैं अब ज़िन्दगी का बोझ

बन खगोल शास्त्री ढूँढना चाहता था जो नए नक्षत्र
आज मात्र दो वक्त की रोटी रह गई है उसकी खोज

अब नहीं खिंचती उसको चाँद-तारों की झिलमिलाहट
पग-पग पर जल रही है उसकी ज़िन्दगी बन कर सोज़

निश्चयही मेरा वतन आज विश्व में सबसे अग्रणी होता
गर मजबूरी ने न तोड़े होते इक 'कलाम'के सपने रोज़

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
सचमुच ये सब देख के मन बहुत रोता है...!!!

ऐसा काम करतें हैं

अपनी ज़िंदगी को यहीं तमाम करतें हैं
चल इसें किसी और के नाम करतें हैं

बहुत दूर तक बहे बदी की इस नदी में
अब नेकी तट पर थोडा विश्राम करते हैं

रग-रग में ईर्ष्या-द्वेष के बेलों की हुंकारें
संयम साधना से उनपे लगाम करतें हैं

हावी है युगों से इस आनन् कई दसानन
इन्हें मिटाने को,खुद ही को राम करतें हैं

मृत्यु-शैया सन्मुख जीवन उत्सव हो जाये
आ पर हित में ऐसा कोई काम करतें हैं

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर से 

इक ऐसा स्वर्णिम सवेरा होगा

इक ऐसा स्वर्णिम सवेरा होगा
फ़िर न कहीं कोई अँधेरा होगा

सूरज उगेगा ऐश्वर्य वैभव का
समृद्धि का घर-घर फेरा होगा

आनंद-उत्सव की होंगी बस्तियां
चमकता हुआ हर चेहरा होगा

विषाद-वेदना जहाँ वर्जित होंगे
प्रहरी सुख प्रमोद का घेरा होगा

गूंजेगी "जय हो" की अनुगूंज
भाल पे कीर्ति का सेहरा होगा

उन्नति-प्रगति की होगी हरियाली
ऐसा सुन्दर भारत -वर्ष मेरा होगा

फिर चहकेगी सोने की चिड़िया
उस दिन धन्य जीवन मेरा होगा

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से
हर इक ज़िंदगी जैसे मौत का घर है
हर साँस खौफ़जदा,हर दिल में डर है
कौन करे किसी की मौत का मातम
यहाँ रूह भी ज़िस्म से बेखबर है
हर तरफ़ है बेइंसाफ़ी की हवाएं
हर तरफ़ दरिया ऐ जोरोज़बर है
खुद का बोझ खुदी को ढोना होगा
रिश्तों की भीड़ में तनहा बसर है
मौत ओ ज़िंदगी में फ़र्क इतना ही
इक कड़वा घूँट ,इक मीठा ज़हर है

मंजिल की तरफ़

मंजिल की तरफ़ हौसला ले जाता है
ज़िक्र हर जगह क़दमो का आता है
इक मोड़ पर आंसू भी छूट जाते हैं
दर्द उम्र भर को तनहा रह जाता है

मार्च 03, 2010

हाथ गुलचीं के खाली रहे चमन फूलों से भर गया

वो भूख से नहीं मरा,वो अपने उसूलों से मर गाया

वस्ल की आरज़ू हिज्र की शब हुई
कम नसीबों की चाह पूरी कब हुई

शबे -सियाह से मुहब्बत कर बैठे
रोशनी हमसे बेवफ़ा जब हुई

अश्कों ने कह दिया हम उफ़ताद हैं
वरन अपनी ज़बां से उफ़ कब हुई

ख़ुदा-परस्ती से जिनके माने थे
वो ही पाकीज़ा मुहब्बतें रब हुई

सावन के अश्क भी थम से गए
मेरी निगाहों से बारिश जब हुई


पलट गई रोशनी मेरे दर तक आते हुए
जो देखा तुम्हे हम से रूठ कर जाते हुए

फ़ज़ा आज इतनी नम-नम सी क्यों है
कोई रोया होगा किसी को भूलाते हुए

बदमाज़ज़ हवा ने जाने क्या कह दिया
लौट गए बादल जलती धरा पे छाते हुए

छटपटा रही है तेरे दीद की ये आरजू
और कितनी देर लगेगी तुझे आते हुए

कैसे जाना कि हम हिन्दू ,मस्लिम या सिख हैं
कुछ तो न लिखा था हम पे ज़हां में आते हुए

उसकी बेवफ़ाई से भी न टूटी थी जितना
उतनी बिखर रही हूँ उसके ख़त लौटाते हुए




हर शै ज़ुल्मतों से घिर गई
निज़ामे -कुदरत किधर गई
रोशनी अमीरों को लुटाकर
बर्क मुफलिसों पर गिर गई
महलों की ठुकराई धूप
किसी चाली पर बिफर गई
गमख्वार बन आई जो सबा
मिरे वीराने से सिहर गई
पत्थर हो चुकी वो हसरतें
आज फ़िर से क्यों बिखर गई

जो तू चल के

जो तू चल के इक बार आ जाये

अज़ल गिरफ़्त को करार आ जाये

अज़ब कशमकश में है मौत मेरी

कहीं फिर न तुझ पे प्यार आ जाये

मेरी पुस्तक "ज़र्रे-ज़र्रे में वो है "से

याद के कोयले

दिल की सिगड़ी में अब तक धधक रहें हैं
तेरी याद के कोयले
चारों और फैलती हुई उसकी तपिश
जलाने लगी है मेरे आस-पास को
अब तो में भी चाहती हूँ कि _
ये जल्द ही तब्दील हो जाये राख में
मुझे मालूम है कि बाद उसके
मैं भी मिल जाउंगी ख़ाक में

मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पे " से

मार्च 02, 2010

तलबगार रहे

जब तलक जीये तेरी दीद के तलबगार रहे
बस यही वज़ह थी कि हम उम्र भर बीमार रहे

जिसने लगाये गुलसन गुल ओ बू की ख़ातिर
उस गुलची के हिस्से में पतझड़ और ख़ार रहे

ख़ता बस ये हुई कि दिल का कहना मान लिया
उसी बिनाय पर हम भी मुजरिमों में शुमार रहे
मेरी पुस्तक "ज़र्रे -ज़र्रे में वो है "के अंश ..

आँखों में

बता ये कौनसा गम इज़्तराब है तेरी आँखों में
ज़रूर कोई अधूरा ख्वाब है तेरी आँखों में

क्यों कतरा-ऐ शबनम छलकाती रहती हैं हर वक्त
हो न हो कोई चेहरा गुलाब है तेरी आँखों में

जाने क्यों चाँद को भी नहीं देखा करते हो आजकल
यकीनन कोई दूजा महताब है तेरी आँखों में

लाख तैरना आये चाहे किसीको वो डूब जाएगा
दर्दो -गम का इक ऐसा गिर्दाब है तेरी आँखों में

नहीं पूछेंगे कैसे काटी तुमने इंतज़ार में उम्र
हर इक लम्हे का ज़वाब है तेरी आँखों में

मेरी पुस्तक "ज़र्रे -ज़र्रे में वो है "से


किसी की याद में

किसी याद में रोती चली गई
खिज़ां भी बहार होती चली गई

उम्र के संग सयानी हुई पीड़
खुद चारागार होती चली गई

फूल की उम्र ज्यों आई करीब
कलियाँ करार खोती चली गयी

इन अंधेरों को पनाह दे कर
रात बदनाम होती चली गई

बोझ ग़रीब के मूलो-सूद का
कई पीढियां ढोती चली गई

क़ाबे-काशी को शक्ल देने में
इंसानियत खोती चली गई

दिल में बेदार हुई जब उम्मीद
नाउम्मीदी सोती चली गई

टीस की सूई दे गया कोई
आँखें लड़ियाँ पिरोती चली गई

पहाड़ों के पीहर से बिछड़ नदी
पिया समंदर की होती चली गई

मेरी पुस्तक ज़र्रे -ज़र्रे में वो है "से

ज़िन्दगी का अलाव

बुझने चला है अब मेरी ज़िन्दगी का अलाव
साँसे भी गीली लकड़ियों सी दुन्धाने लगी है
हो सके तो आ के बुझा दे इस इंतज़ार को
मेरी मौत की आँखें भी डब-डबाने लगी है
मेरी पुस्तक ज़र्रे -ज़र्रे मै वो है "से

सहरा बनाने की जिद पाले हुए है

ये अश्क उन लोगों की ख़ातिर जाया न करो
जो तुम्हे सहरा बनाने की ज़िद पाले हुए हैं
देखना एक दिन वो ही तेरे हाथ कटवा देंगे
जिनकी लगी बुझाते हुए इनमे छाले हुए हैं
मेरी पुस्तक "ज़र्रे -ज़र्रे में वो है "से