फ़रवरी 11, 2010

काश !

काश !ये दिल दिल्ली की कुर्सी होता ,
फिर ये कभी न टूटता न तनहा होता
इस को पा लेने की कईयों में होड़ होती,
संभालने में मेहनत क़मर तोड़ होती
ये भी कईयों को आजमाता,मौका देता,
सज़ा उसको देता जो इसको धोका देता
जो इसको लगता वफ़ादार,इसमें वापस आता ,
इसके साथ दग़ा करने पर बुरा हाल होता ,
वो पांच साल या इससे पहले ही रोता
इसके साथ खेलना इतना आसन न होता,
जो करता ऐसी नादानी पश्चाताप में रोता
वफ़ादारों को परखने को समय की परिधी होती,
बेवफ़ाओं को हटाने के लिए कोई विधि होती
हर किसी के सपनों का ये सरताज़ होता,
काश !ये दिल दिल्ली की कुर्सी होता
मेरी पुस्तक "दो बूँद समुद्र के नाम "से

9 टिप्‍पणियां:

Bhadauria ने कहा…

आपकी कलम सदा ऐसी ही चलती रहे,और आगे बढते रहें.बहुत बहुत साधुवाद.

Asha Pandey Ojha ने कहा…

aapka hardik aabhar Bhadauria sir

H P SHARMA ने कहा…

naye blog ka swaagat hai asha ji

meenakshi ने कहा…

वफ़ादारों को परखने को समय की परिधी होती,
बेवफ़ाओं को हटाने के लिए कोई विधि होती
.....so nice and beautiful!!!

meenakshi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Manju Khurana ने कहा…

bahut sunder rachna,shubh kamnaye Ashaji

तीसरी आंख ने कहा…

अति सुंदर

Naveen pandey ने कहा…

asha ji nice

Dinesh Mishra ने कहा…

अति सुंदर.......!!