मार्च 16, 2010

ये आंसू

ये आंसू फिर आज दीवाने हैं

फिर यादों में मीत पुराने हैं

जान चुके हम जिन को दिल से

क्यों रिश्ते वही अनजाने हैं

लाख छुपाऊँ जग से बातें

ढलकर अश्क कह जाने हैं

दर्द भरे इन रिश्तों के

आख़िरी हिचकी तक माने हैं

टूट गएँ हैं पर न बिखरेंगे

ज़ख्में जिगर तुझे दिखाने हैं

इन अश्कों को हम न पोंछेंगे

तेरे दिए जो नजराने हैं

आ जाओ तो जी भर रोलें

अश्कों के मोती तुम पे लुटाने हैं

खुद को तन्हा कैसे कह दें

साथ मेरे तेरे अफ़साने हैं

हर इक दोलत साए में है

जब तक तेरी याद के खजाने हैं

तुमको चाह कर कुछ ना चाहा

सरशारी मेरी रब भी जाने हैं

हैं कितने गहरे दिल के रिश्ते

ये अश्क उसी के पैमाने हैं

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर'

5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

aasha ji aaj lagbhag chaar baar aap ke blog par aaya aur kament karne ka pryash ki par ho hi nahi raha tha ab lagta hai ho jaye ga
bhut behtreen kavita hai
ye laayne to khashh
इन अश्कों को हम न पोंछेंगे

तेरे दिए जो नजराने हैं
saadar
praveen pathik
9971969084

kishor kumar khorendra ने कहा…

खुद को तन्हा कैसे कह दें

साथ मेरे तेरे अफ़साने हैं

vah ........bahut sundar

Shayar Ashok ने कहा…

तुमको चाह कर कुछ ना चाहा
सरशारी मेरी रब भी जाने हैं

हैं कितने गहरे दिल के रिश्ते
ये अश्क उसी के पैमाने हैं

वाह दीदी !!!
बहुत खूब ..
पढ़कर, आनंद आ गया ...

HARI SHARMA ने कहा…

आप बहुत अच्छा लिखती है.

L.m ने कहा…

vah kya likhati hen aap , aap koi kavi hen ya lekhak

veri very mauch more and more
thaks