मार्च 12, 2010

आ पहुंचा सृष्टि का काल


छुपे अंगारे दीपक लो में
लहुलुहान रंग -ओ -गुलाल है
संभल के उड़ना ओ रे पंछी
हर दिशा प्रलय का जाल है
विष का सागर नीलम आँखे
मुस्काने प्रवंचना की चाल है
राम सा आनन रावण मन
छल ने धरी मृग -छाल है
परख पहन रिश्तों के चोले
घात में बैठा विष व्याल है
मौत के घुंघरू छनक उठे
विध्वंस देता करताल है
घर -दरवाज़े थाप ठोकता
आ पहुंचा सृष्टि का काल है

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर " से

4 टिप्‍पणियां:

Shayar Ashok ने कहा…

परख पहन रिश्तों के चोले
घात में बैठा विष व्याल है ..

ये आज के युग की सच्चाई है .
सच में, आ पहुंचा सृष्टि का काल है !

बहुत खूब दीदी ....
बधाई स्वीकारें !!

Shayar Ashok ने कहा…

परख पहन रिश्तों के चोले
घात में बैठा विष व्याल है

ये आज के युग की सच्चाई है ..
सच में, आ पहुंचा सृष्टि का काल है |

बहुत खूब, दीदी ...
बधाई स्वीकारें !

अरुणेश मिश्र ने कहा…

स्वर्ण हिरनी ने छला होगा । लक्ष्मण कोसोँ चला होगा । मन जटायु लक्ष्य को लेकर सूर्य के सम्मुख जलाहोगा । स्वाँति तृष्णा की व्यथा परिपूर्ण ,
रुद्ध चातक का गला होगा । एक सीता ले गया रावण
आज कंचन मृग खला होगा ।
वर्त्तमान पर आपकी अभिव्यक्ति सामयिक है । प्रशंसनीय ।

jitendra ने कहा…

मौत के घुंघरू छनक उठे
विध्वंस देता करताल है
घर -दरवाज़े थाप ठोकता
आ पहुंचा सृष्टि का काल है

वर्तमान युग का यथार्थवादी चित्रण ..साधुवाद ..!